Bihar Board Class 7 Sanskrit Chapter-5 प्रहेलिकाः Summary
[सभी भाषाओं में बौद्धिक विकास के लिए पहेलियों की परम्परा रही है। संस्कृत में भी अनेक पहेलियाँ प्राचीन काल से प्रचलित रही है और आजा भी जोड़ी जा रही है। इनसे श्रोताओं का बौद्धिक व्यायाम होता है । पत्र-पत्रिकाओं में भी नई-नई पहेलियाँ दी जाती हैं । प्रस्तुत पाठ में ऐसी पाँच पहेलियाँ पद्य-बद्ध रूप में दी गयी हैं जिनसे पाठकों का मनोरंजन होगा ।
अपदो दूरगामी च…………….यो जानाति स पण्डितः ॥1॥
शब्दार्थ-अपदः – बिना पैर वाला । दरगामी – दुर जाने वाला । पण्डितः – विद्वान् । साक्षरः = अक्षरयुक्त, पढ़ा हुआ । अमुखः – बिना मुख वाला । स्फुटवक्ता – स्पष्ट बोलने वाला । यः = जो । जानाति – जानता है।
सरलार्थ-पैर नहीं है और दूर तक जाता हूँ, अक्षर युक्त हूँ लेकिन पण्डित नहीं हूँ। मुख नहीं है लेकिन स्पष्ट बोलता हूँ । जो जानता है वह पण्डित है। (पत्र)
न तस्यादिः न तस्यान्तः……………यदि जानासि तद् वद ॥2॥
शब्दार्थ-तस्यादिः (तस्य+आदिः) – उसका आरंभ । तस्यान्तः (तस्य अन्तः) – उसका अंत । मध्ये – बीच में । ममाप्यस्ति (मम अपि अस्ति) – मुझे भी है । तवाप्यस्ति – तुम्हें भी है । वद – कहो, बोलो । .
सरलार्थ-न तो उसके प्रारंभ में हूँ और न अन्त में । बीच में रहता हूँ। मुझे भी और तुझे भी है । यदि जानते हो तो कहो । (नयन)
नानं फलं वा खादामि………………….समय बोधयामि च ॥3॥
शब्दार्थ- नान्नम् (न अन्नम्) – अन्न नहीं । क्वचित् – कहीं । चलामि = चलता हूँ। दिवसे = दिन में । रात्रौ = रात में। बोधयामि = बतलाता हूँ।
सरलार्थ-न तो अन्न खाता हूँ, न फल खाता हूँ और न कभी जल पीता हैं। दिन-रात चलता रहता हूँ और समय बतलाता हूँ । (घड़ी)
मुखं कृष्णं वपुः क्षीणं………………रसवत्यां वसाम्यहम् ॥4॥
शब्दार्थ- कृष्णम् – काला । वपुः = शरीर । क्षीणम् – दुबला-पतला। मञ्जूषायाम् – पेटिका में, पेटी में । संवृतम् = ढंका हुआ, बंद । घर्षणम् – रगड़ना । दहत्याशु (दहति+आशु) = शीघ्र जलता है । आशु – शीघ्र। रसवत्याम् (रसवती, सप्तमी, एक) = रसोई में । वसाम्यहम् (वसामि अहम) – रहता/रहती हूँ।
सरलार्थ-मख काला है. शरीर पतला है, पेटी में बन्द रहता हूँ, रगड़ने पर शीघ्र जलता हूँ और रसोई घर में रहता हूँ । (माचिस)
तिष्ठामि पादेन बको न पयः ………………..सेव्योऽस्मि कोऽहं नपतिर्न देवः ॥5॥
शब्दार्थ- तिष्ठामि – ठहरता / ठहरती हूँ । पादेन – एक पैर से। बकः – बगुला । पङ्गुः – लँगड़ा । दाता – दानी । फलानाम् – फलों का। कृतिः – कर्म । यलः = परिश्रम । मौनेन = चुप रहने से । जीवामि – जीता । जीती हूँ। मूकः – गूंगा । सेव्योऽस्मि (सेव्य: अस्मि)- सेवन करने योग्य हूँ। कोऽहम् (क: अहम्) – मैं कौन हूँ। नृपतिः – राजा । देवः – देवता।
सरलार्थ-मैं एक पैर से ठहरता हूँ न तो मैं बगला है और न लँगडा । __ फलों का दानी हूँ विना परिश्रम और कर्म के । मूक होकर रहता हूँ न तो मैं मनि हैं और न गंगा । सेवन करने योग्य हूँ न राजा हूँ और न देवता । (वृक्ष) (प्रहेलिका-संङ्कताः – पत्रपुटम्, नयनम्, घटिका, अग्निशलका, वृक्षः)
व्याकरणम्
सन्धि-विच्छेदः
तस्यादिः = तस्य + आदिः (दीर्घ सन्धि)
तस्यान्त: = तस्य + अन्तः (दीर्घ सन्धि)
ममाप्यस्ति = मम + अपि + अस्ति (दीर्घ, यण सन्धि)
तवाप्यस्ति = तव + अपि + अस्ति (दीर्घ, ण् सन्धि)
नान्नम् = न + अन्नम् (दीर्घ सन्धि)
दहत्याशु = दहति + आशु (यण सन्धि)
कृतिर्न = कृतिः + न (विसर्ग सन्धि)
मुनिर्न = मुनिः + न (विसर्ग सन्धि)
सेव्योऽस्मि = सेव्यः + अस्मि (विसर्ग सन्धि)
कोऽहम् = कः + अहम् (विसर्ग सन्धि)
नृपतिर्न = नृपतिः + न (विसर्ग सन्धि)
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