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Bihar Board Sanskrit समास – परिभाषा, भेद-अव्ययीभाव समास, तत्पुरुष समास (द्विगुसमास , कर्मधारय समास)द्वन्द्वसमास एवं बहुव्रीहि समास तथा उदाहरण

Bihar Board Sanskrit समास – परिभाषा, भेद-अव्ययीभाव समास, तत्पुरुष समास (द्विगुसमास , कर्मधारय समास)द्वन्द्वसमास, बहुव्रीहि समास एवं उदाहरण

समास
परिभाषा:-अनेकेषां_पदानां_एकपदी_भवनं_समासः।
 
दो या दो से अधिक पदों का एक पद हो जाना , समास कहलाता है ।
समास’ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है ‘छोटा-रूप’।
इसके दो पद होते हैं पूर्वपद और उत्तरपद।

समास-विग्रह :-
किसी समस्त पद या सामासिक शब्द को उसके विभिन्न पदों एवं विभक्ति सहित पृथक् करने की क्रिया को समास का विग्रह कहते हैं। 

समासा: द्विधा :-
1- केवलसमास: ।
2- विशेषसमास: ।
(केवलसमास: - तत्‍पुरुषादिसंज्ञाविनिर्मुक्‍त: समाससंज्ञामात्रयुक्‍त: केवलसमास: । 
अर्थात् यस्‍य समासस्‍य नास्ति नाम कश्चित् स: समास: केवलसमास: इति अभिधीयते । )

विशेषसमास: -
विशेषसमास: चतुर्धा -समास मुख्यत: चार प्रकार के होते हैं।

1- अव्ययीभावसमास: 
सूत्र :-पूर्वपदार्थप्रधानो_अव्ययीभाव: ।
         
(इसका पहला पद अव्यय  तथा प्रधान होता है।
उपसर्ग युक्त पद भी अव्ययीभाव समास होते हैं।)

यथा:-
 समीपार्थक: - कृष्‍णस्‍य समीपम् - उपकृष्‍णम् 
अभावार्थक: - मक्षिकाणाम् अभाव: - निर्मक्षिकम्
योग्‍यतार्थक: - रूपस्‍य योग्‍यम् - अनुरूपम् 
वीप्सार्थक: - दिनं दिनं प्रति - प्रतिदिनम्
पदार्थानतिवृ्‍यर्थक: - शक्तिम् अनतिक्रम्य 
मर्यादार्थक: - आ मुक्‍ते: - आमुक्ति: (संसार:)
अभिविध्यर्थक: - आ बालेभ्‍य: - आबालम् (हरिभक्ति:)
आभिमुख्यार्थक: - अग्निम् अभि - अभ्‍यग्नि
मात्रार्थक: - शाकस्‍य लेश: - शाकप्रति 
अवधारणार्थक: - यावन्‍त: श्‍लोका: - यावच्‍छ्लोकम्
पारेशब्दयुक्‍त: - पारे समुद्रस्‍य - पारेसमुद्रम् 
मध्येशबदयुक्त: - मध्‍ये गंगाया: - मध्‍येगंगम्  आदि ।

2- तत्पुरुषसमास: -

सूत्र :-उत्तरपदार्थप्रधानो_तत्पुरुष: ।
       (कारक चिन्हों से विग्रह वाला समास तत्पुरुष समास होता है। इसका उत्तर पद प्रधान होता है।)

यथा:-
*प्रथमा तत्‍पुरूष: - अर्धं ग्रामस्‍य - अर्धग्राम: 
*द्वितीया तत्‍पुरूष: - गृहं गत: - गृहगत:
*तृतीया तत्‍पुरूष: - नखै: भिन्‍न: - नखभिन्‍न: 
*चतुर्थी तत्‍पुरूष: - गवे हितम् - गोहितम्
*पंचमी तत्‍पुरूष: - चोरात् भयम् - चोरभयम् 
*षष्‍ठी तत्‍पुरूष: - वृक्षस्‍य मूलम् - वृक्षमूलम्
*सप्‍तमी तत्‍पुरूष: - कार्ये कुशल: - कार्यकुशल: आदि।


    (क)-द्विगु: समास:
सूत्र:- संख्यपूर्वे द्विगु ।
     द्विगुसमास: अपि तत्‍पुरुषस्‍यैव भेद: ।  
                 एष: त्रिधा ।
 (द्विगु समास में पूर्व पद संख्यावाचक होता है। इसका उत्तर पद प्रधान होता है।)
   यथा :-
  समाहारद्विगु: - त्रयाणां लोकानां समाहार: - त्रिलोकी 
  तत्रितार्थद्विगु: - षण्‍णां मातृणाम् अपत्‍यम् -  षाण्‍मातुर: 
   उत्‍तरपदद्विगु: - पंच गाव: धनं यस्‍य स: - पंचगवधन: आदि ।

  (ख)-कर्मधारय: समास:
सूत्र :-तत्पुरुष: समानाधिकरणः कर्मधारय: ।

(कर्मधारय समास के दोनों पदों  में विशेषण-विशेष्य तथा उपमेय-उपमान का संबंध होता है।)

विशेषणपूर्वपद: - नीलो मेघ: - नीलमेघ
विशेषणोत्‍तरपद: - वैयाकरण: खसूचि: - वैयाकरणखसूचि:

विशेषणोभयपद: - शीतम् उष्‍णम् - शीतोष्‍णम् 
उपमानपूर्वपद: - मेघ इव श्‍याम: - मेघश्‍याम:
उपमानोत्‍तरपद: - नर: व्‍याघ्र: इव - नरव्‍याघ्र: 
अवधारणापूर्वपद: - विद्या इव धनम् - विद्याधनम्
सम्‍भावनापूर्वपद: - आम्र: इति वृक्ष: - आम्रवृक्ष: 
मध्‍यमपदलोप: - शाकप्रिय: पार्थिव: - शाकपार्थिव:
मयूरव्‍यंसकादि: - अन्‍यो देश: - देशान्‍तरम् आदि ।


3- बहुब्रीहिसमास: -

सूत्र :-अन्यपदार्थप्रधानो_बहुब्रीहि: ।

यस्मिन् पदे पूर्वोत्‍तरद्वयोरपि प्राधान्‍यं न भवति अपितु कस्‍यचित् अन्‍यस्‍य एव शब्‍दस्‍य प्राधान्‍यं भवति तत्र बहुब्रीहि समास: भवति ।  

(इसमें प्रयुक्त पदों के सामान्य अर्थ की अपेक्षा अन्य अर्थ की प्रधानता रहती है।)*
 यथा :-
लम्बोदरः - लम्बम् उदरं यस्य: सः ( गणेश:),
वीणापाणी - वीणा पाणौ यस्या सा ( सरस्वती ),
निलकंठः - निलः कंठः यस्य: सः ( शिव: )  आदि ।


4- द्वन्‍द्व समास: -

सूत्र:-उभयपदार्थप्रधानोद्वन्द्व: ।
यत्र उभयशब्‍दयो: प्राधान्‍यं भवति स: समास: द्वन्‍द्व: इति कथ्‍यते ।
  (समास में दोनों पद प्रधान होते हैं।
दोनों पद प्रायः एक दूसरे के विलोम होते हैं, सदैव नहीं।
इसका विग्रह करने पर ‘और’ का प्रयोग होता है।)
यथा -
 रामकृष्णौ -रामः च कृष्णः च 
           दंपत्ति - जाया च पतिः च 
           पितरौ - माता च पिता च
          पाणिपादं - पाणी च पादौ च आदि ।

।।सधु चन्द्र।।

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