समास – परिभाषा, भेद(अव्ययीभाव समास, तत्पुरुष समास, द्विगुसमास , द्वन्द्वसमास, बहुव्रीहि समास, कर्मधारय समास) एवं उदाहरणSamas in hindi
समास – परिभाषा, भेद(अव्ययीभाव समास, तत्पुरुष समास, द्विगुसमास , द्वन्द्वसमास, बहुव्रीहि समास, कर्मधारय समास) एवं उदाहरण
Samas in hindi
समास का तात्पर्य है ‘संक्षिप्तीकरण’। दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए एक नवीन एवं सार्थक शब्द को समास कहते हैं। जैसे – ‘रसोई के लिए घर’ इसे हम ‘रसोईघर’ भी कह सकते हैं। संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं में समास का बहुतायत में प्रयोग होता है।
परिभाषा- समास के नियमों से निर्मित शब्द सामासिक शब्द कहलाता है। इसे समस्तपद भी कहते हैं। समास होने के बाद विभक्तियों के चिह्न (परसर्ग) लुप्त हो जाते हैं। जैसे-राजपुत्र।
समास-विग्रह
सामासिक शब्दों के बीच के संबंधों को स्पष्ट करना समास-विग्रह कहलाता है।विग्रह के पश्चात सामासिक शब्दों का लोप हो जाताहै जैसे-राज+पुत्र-राजा का पुत्र।
पूर्वपद और उत्तरपद
समास में दो पद (शब्द) होते हैं। पहले पद को पूर्वपद और दूसरे पद को उत्तरपद कहते हैं। जैसे-गंगाजल। इसमें गंगा पूर्वपद और जल उत्तरपद है।
समास के छः भेद हैं:
अव्ययीभाव
तत्पुरुष
द्विगु
कर्मधारय
द्वन्द्व
बहुव्रीहि
1. अव्ययीभाव समास
जिस समास का पहला पद(पूर्व पद) प्रधान हो और वह अव्यय हो उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। जैसे – यथामति (मति के अनुसार), आमरण (मृत्यु कर) इनमें यथा और आ अव्यय हैं।
कुछ अन्य उदाहरण –
आजीवन – जीवन-भर
यथासामर्थ्य – सामर्थ्य के अनुसार
यथाशक्ति – शक्ति के अनुसार
यथाविधि- विधि के अनुसार
यथाक्रम – क्रम के अनुसार
भरपेट- पेट भरकर
हररोज़ – रोज़-रोज़
हाथोंहाथ – हाथ ही हाथ में
रातोंरात – रात ही रात में
प्रतिदिन – प्रत्येक दिन
बेशक – शक के बिना
निडर – डर के बिना
निस्संदेह – संदेह के बिना
प्रतिवर्ष – हर वर्ष
अव्ययी समास की पहचान – इसमें समस्त पद अव्यय बन जाता है अर्थात समास लगाने के बाद उसका रूप कभी नहीं बदलता है। इसके साथ विभक्ति चिह्न भी नहीं लगता।
2. तत्पुरुष समास
जिस समास का उत्तरपद प्रधान हो और पूर्वपद गौण हो उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। जैसे – तुलसीदासकृत = तुलसीदास द्वारा कृत (रचित)
ज्ञातव्य- विग्रह में जो कारक प्रकट हो उसी कारक वाला वह समास होता है।
विभक्तियों के नाम के अनुसार तत्पुरुष समास के छह भेद हैं-
कर्म तत्पुरुष
करण तत्पुरुष
संप्रदान तत्पुरुष
अपादान तत्पुरुष
संबंध तत्पुरुष
अधिकरण तत्पुरुष
कर्म तत्पुरुष (विभक्ति – को)
कर्म तत्पुरुष समास में कर्म कारक की विभक्ति “को” का लोप होता है। अर्थात इसके समस्त पदों का विग्रह करते समय, कर्म कारक की विभक्ति “को” का प्रयोग किया जाता है। परंतु समस्य पद बनाते समय उस “को” विभक्ति का लोप हो जाता है। उदाहरण :
परलोक गमन ― परलोक को गमन
स्वर्ग प्राप्त ― स्वर्ग को प्राप्त
स्वर्गगत ― स्वर्ग को गया हुआ
गृहागत ― गृह को आगत
शरणागत ― शरण को आगत
ग्रामगत ― ग्राम को गया हुआ
यशप्राप्त ― यश को प्राप्त
मरणासन्न ― मरण को पहुँचा हुआ
सुखप्राप्त ― सुख को प्राप्त करने वाला
चिड़ीमार ― चिड़ियों को मारने वाला
पतितपावन ― पापियों को पवित्र करने वाला
माखनचोर ― माखन को चुराने वाला
कष्टापन्न ― कष्ट को आपन्न (प्राप्त)
संकटापन्न ― संकट को आपन्न (प्राप्त)
कठफोड़ा (कठफोड़वा) ― काठ को फोड़ने वाला (परसी)
विद्युतमापी ― विद्युत को मापने वाला
वयःप्राप्त ― वय (उम्र) को प्राप्त
पक्षधर ― पक्ष को धारण करने वाला
दिलतोड़ ― दिल को तोड़ने वाला
प्राप्तोदक ― उदक (जल) को प्राप्त
कनकटा ― कान को कटवाया हुआ
नककटा ― नाक को कटवाया हुआ
जेबकतरा ― जेब को कतरने वाला
जगसुहाता ― जग को सुहाने वाला
तिलकुटा ― तिल को कूटकर बनाया हुआ
सर्वज्ञ ― सर्व (सब) को जानने वाला
नरभक्षी ― नर को भक्षित करने वाला
स्याहीचूस ― स्याही को चूसने वाला
जितेन्द्रिय ― इंद्रियों को जीतने वाला
मनोहर ― मन को हरने वाला
विद्याधर ― विद्या को धारण करने वाला
खड्गधर ― खड्ग को धारण करने वाला
करण तत्पुरुष (से/के द्वारा)
करण तत्पुरुष मे करण कारक की विभक्ति “से/के द्वारा” का लोप् होता है। पर विग्रह करते समय यह “से/के द्वारा” विभक्ति दिखाई देता है।उदाहरण :
नेत्रहीन ― नेत्र से हीन
रसभरा ― रस से भरा
मुहमांगा ― मुँह से माँगा गया
अकालपीड़ित ― अकाल से पीड़ित
तुलसीकृत ― तुलसी द्वारा कृत
ईश्वरदत्त ― ईश्वर द्वारा दिया हुआ
ईश्वरप्रदत्त ― ईश्वर द्वारा दिया हुआ
गुरुदत्त ― गुरु द्वारा दिया हुआ
सूररचित ― सूर के द्वारा रचित
हस्तलिखित ― हाथ के द्वारा लिखित
पददलित ― पद से दलित
गुणयुक्त ― गुण से युक्त
दयार्द्र ― दया से आर्द्र (नम)
कष्ट साध्य ― कष्ट से साध्य
पपड़छना ― कपड़े से छना हुआ
रेखांकित ― रेखा से अंकित
मदमस्त ― मद से मस्त
मनगढ़त ― मन से गढ़ा हुआ
प्रेमातुर ― प्रेम से आतुर
भयाकुल ― भय से आकुल
वाग्युद्घ ― वाक् से युद्ध
आचारकुशल ― आचार से कुशल
नीतियुक्त ― नीति से युक्त
शराहत ― शर से आहत
मदमाता ― मद से माता
प्रेमसिक्त ― प्रेम से सिक्त
जलसिक्त ― जल से सिक्त (गीला/भीगा)
करण तत्पुरुष समास के अन्य उदाहरण
मेघाच्छन्न ― मेघ से आच्छन्न
रोगपीड़ित ― रोग से पीड़ित
रोगग्रस्त ― रोग से ग्रस्त
दुआर्त ― दुःख से आर्त
मदान्ध ― मद से अन्धा
मुँहचोर ― मुँह से चोर
कामचोर ― काम से चोर
देहचोर ― देह से चोर
शोकार्त ― शोक से आर्त
शोकग्रस्त ― शोक से ग्रस्त
शोकाकुल ― शोक से आकुल
करुणापूर्ण ― करुणा से पूर्ण
श्रमजीवी ― श्रम से जीने वाला
दुःखसन्तप्त ― दुख से सन्तप्त
तारोभरी ― तारों से भरी
स्नेहाविष्ट ― स्नेह से आविष्ट
रेलयात्रा ― रेल के द्वारा यात्रा
क्षुधातुर ― क्षुधा (भूख) से आतुर
दस्तकारी ― दस्त (हाथ) से किया गया कार्य
स्वयंसिद्ध ― स्वयं से सिद्ध
पंतप्रणीत ― पंत द्वारा प्रणीत (रचित)
विधिनिर्मित ― विधि द्वारा निर्मित
भुखमरा ― भूख से मरा
घृतमिश्रित ― घृत से मिश्रित
व्यहारकुशल ― व्यवहार से कुशल
सम्प्रदान तत्पुरुष समास
जिस तत्पुरुष समास में विभक्ति “ के लिए ” का लोप होता है,सम्प्रदान तत्पुरुष समास कहलाता है।
सम्प्रदान तत्पुरुष समास के उदाहरण
मार्गव्यय ― मार्ग के लिए व्यय
हथकड़ी ― हाथ के लिए कड़ी
हथघड़ी ― हाथ के लिए घड़ी
यज्ञशाला ― यज्ञ के लिए शाला
गौशाला ― गायों के लिए शाला
कृष्णार्पण ― कृष्ण के लिए अर्पण
शिवार्पण ― शिव के लिए अर्पण
राहखर्च ― राह के लिए खर्च
ब्राह्मदक्षिणा ― ब्राह्मण के लिए दक्षिणा
शरणागत ― शरण को आगत
गुरुदक्षिणा ― गुरु के लिए दक्षिणा
साधुदक्षिणा ― साधु के लिए दक्षिणा
स्वागतगान ― स्वागत के लिए मान
यज्ञाहुति ― यज्ञ के लिए आहुति
रसोईघर ― रसोई के लिए घर
स्नानघर ― स्नान के लिए घर
आरामकुर्सी ― आराम के लिए कुर्सी
क्रीड़ास्थल ― क्रीडा के लिए स्थल
डाकगाड़ी ― डाक के लिए गाड़ी
लोकहितकारी ― लोक के लिए हितकारी
मालगोदाम ― माल के लिए गोदाम
पुत्रशोक ― पुत्र के लिए शोक
डाकमहसूल ― डाक के लिए महसूल (कर अथवा लगान)
विधानसभा ― विधान के लिए सभा
विधान भवन ― विधान के लिए भवन
सभाभवन ― सभा के लिए भवन
कर्णफूल ― कर्ण (कान) के लिए फूल
शपथपत्र ― शपथ के लिए पत्र
काकबलि ― काक (कौआ) के लिए बलि
समाचार पत्र ― समाचार के लिए पत्र
आवेदन पत्र ― आवेदन के लिए पत्र
आपादान तत्पुरुष समास
आपादान तत्पुरुष समास मे अपादान कारक की विभक्ति “से-अलग होने” का लोप होता है। यहां पर जो “से” का लोप होता है, वो एक चीज़ का दूसरे चीज़ से अलग होते हुए नज़र आता है। जैसे :
देशनिकाला ― देश से निकाला
देशनिर्वासित ― देश से निर्वासित
स्थानभ्रष्ट ― स्थान से भ्रष्ट
धर्मभ्रष्ट ― धर्म से भ्रष्ट
पदभ्रष्ट ― पद से भ्रष्ट
पथभ्रष्ट ― पथ से भ्रष्ट
भाग्यहीन ― भाग्य से हीन
दूरागत ― दूर से आगत
जन्माध ― जन्म से अंधा
रणविमुख ― रण से विमुख
भार रहित ― भार से रहित
धर्मविमुख ― धर्म से विमुख
धर्मच्युत ― धर्म से च्युत
स्थानच्युत ― स्थान से हटाया हुआ
पदच्युत ― पद से हटाया हुआ
सत्ताच्युत ― सत्ता से च्युत
जातिच्युत ― जाति से च्युत
भयमीत ― भय से भीत
कर्मरहित ― कर्म से रहित
मरणोत्तर ― मरण ‘से’ उत्तर (परे)
लोकोतर ― लोक ‘से उतर
नेत्रहीन ― नेत्र से हीन
बलहीन ― बल से हीन
शक्तिहीन ― शक्ति से हीन
धनहीन ― धन से हीन
पापमुक्त ― पाप से मुक्त
व्ययमुक्त ― व्यय से मुक्त
मायारिक्त ― माया से रिक्त
बंधनमुक्त ― बंधन से मुक्त
रोजगारवंचित ― रोजगार से वंचित
सेवानिवृत्त ― सेवा से निवृत्त
विवाहेतर ― विवाह से इतर (भिन्न)
संबंध तत्पुरुष (का, की, के)
यहाँ संबंध कारक की विभक्ति “का, की, के” का लोप होता है। जैसे -
कृष्णमूर्ति ― कृष्ण की मूर्ति
देवमूर्ति ― देवों की मूर्ति
रामभक्ति ― राम की भक्ति
भारतरत्न ― भारत की रत्न
सचिवालय ― सचिव की आलय
देशसुधार ― देश का सुधार
देशरक्षा ― देश की रक्षा
देशसेवा ― देश की सेवा
देशवासी ― देश के वासी
स्वास्थ्यरक्षा ― स्वास्थ की रक्षा
गोबरगणेश ― गोबर का गणेश
ब्राह्मणपुत्र ― ब्राह्मण का पुत्र
राजपुत्र ― राजा का पुत्र
राजमाता ― राजा का माता
राजकन्या ― राजा की कन्या
वीरकन्या ― वीर की कन्या
राजभवन ― राजा का भवन
राजगृह ― राजा का गृह
अन्नदाता ― अन्न को देने वाला
अन्नदान ― अन्न का दान
प्रसंगानुसार ― प्रसंग के अनुसार
कनकघर ― कनक सोने का घर
राजदरबार ― राजा कादरबार
सभापति ― सभा का पति
सेनापति ― सेना का पति
घुड़दौड़ ― घोड़ों की दौड़
जीवनसाथी ― जीवन का साथी
उद्योगपति ― उद्योगों का पति
राष्ट्रपति ― राष्ट्र का पति
प्रधानपति ― प्रधान का पति
विद्याभण्डार ― विद्या का भंडार
विद्यासागर ― विद्या का सागर
गुरुसेवा ― गुरु की सेवा
सेनानायक ― सेना का नायक
ग्रामोद्धार ― ग्राम का उद्धार
मृगछौना ― मृग का छौना (छाल)
लखपति ― लाखों (रुपये) का पति
विद्याभ्यास ― विद्या का आभास
अतः का, की, के अर्थात संबंध कारक की विभक्ति विग्रह करने पर दिखाई दे रही है, परन्तु समस्त पदों में इसका लोप हो रहा है।
अधिकरण तत्पुरुष (में/पर)
अधिकरण तत्पुरुष समास मे अधिकरण कारक की विभक्ति “मे/पर दोनो” का लोप होता है। अर्थात विग्रह करते समय मे/पर विभक्ति का प्रयोग किया जाता है। परंतु समस्त पदों में मे/पर विभक्तियों का लोप होता है। जैसे –
ध्यानमग्न ― ध्यान में मग्न
जलमग्न ― जल में मग्न
आपबीती ― अपने पर बीती
घुड़सवार ― घोड़े पर सवार
रथारूढ़ ― रथ पर आरूढ़
आत्मविश्वास ― आत्म में विश्वास
गृहप्रवेश ― गृह में प्रवेश
ग्रामवास ― ग्राम में वास
शरणागत ― शरण में आगत
विचारलीन ― विचारों में लीन
लोकप्रिय ― लोक में प्रिय
विद्याप्रवीण ― विद्या में प्रवीण
डिब्बाबंद ― डिब्बा में बन्द
दानवीर ― दान में वीर
शास्त्रप्रवीण ― शास्त्र में प्रवीण
स्नेह मग्न ― स्नेह में मग्न
कविपुंगव ― कवियों में पुंगव (श्रेष्ठ)
आत्मनिर्भर ― आत्म पर निर्भर
क्षत्रियाधम ― क्षत्रियों में अधम
कविश्रेष्ठ ― कवियों में श्रेष्ठ
कुलश्रेष्ठ ― कुल में श्रेष्ठ
मुनिश्रेष्ठ ― मुनियों में श्रेष्ठ
कलानिपुण ― कला में निपुण
नीतिनिपुण ― नीति में निपुण
आनंदमग्न ― आनंद में मग्न
विचारमग्न ― विचार में मग्न
पेटदर्द ― पेट में दर्द
सिरदर्द ― सिर में दर्द
पुरुषसिंह ― पुरुषों में सिंह
पुरुषोत्तम ― पुरुषों में उत्तम
स्वर्गवासी ― स्वर्ग में बसने वाला
कर्त्तव्यपराणता ― कर्त्तव्य में परायण
इनके अतिरिक्त
नञ् तत्पुरुष समास – पहला पद नकारात्मक
इस समास मे पहला पद नकारात्मक होता है। जैसे : असत्य – न सत्य,
अधर्म – न धर्म,
अनाथ – न नाथ,
अज्ञान – न् ज्ञान,
अमर – न मर,
अनर्थ – न अर्थ
अनदेखा ― न देखा हुआ
अनश्वर ― न नश्वर
अनचाही ― न चाही
अनादि ― न आदि
अनंत ― न अंत
असत्य ― न सत्य
अनिच्छा ― न ईच्छा
अनिच्छुक ― न इच्छुक
अकर्मण्य ― न कर्मण्य
अधीर ― न धीर
असंख्या ― न संख्या
अनपढ़ ― न पढ़ा हुआ
अनावश्यक ― न आवश्यक
नापसंद ― न पसंद
नगण्य ― न गण्य (गणना)
असभव ― न सम्भव
अप्रिय ― न प्रिय
अनबन ― न बनना
अस्थिर ― न स्थिर
अकाज ― न काज (कार्य)
अमंगल ― न मंगल
अदृश्य ― न दृश्य
अलुक तत्पुरूष समास
जिस समास में पहले शब्द के बाद कारक चिह्न किसी न किसी रूप में विद्यमान रहते हैं, उसे अलुक तत्पुरूष कहते हैं।
अलुक तत्पुरूष समास के उदाहरण
मृत्युञ्जय – मृत्यु को जीतना
धनञजय – धन को जीतना
वाचस्पति – वाच् (वाणी) के पति
मनसिज – मन में जन्म लेने वाला
कर्मणिप्रयोग – कर्म से सम्बन्धित प्रयोग
कर्तरिप्रयोग – कर्ता से सम्बन्धित प्रयोग
युधिष्ठिर – युद्ध मे स्थिर
थानेदार – थाने के दार (प्रभारी)
3.कर्मधारय समास
जिस समास का उत्तरपद प्रधान हो और पूर्वपद व उत्तरपद में विशेषण-विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय का संबंध हो वह कर्मधारय समास कहलाता है। जैसे
विशेषण–विशेष्य :
1. महाराज – महान है जो राजा
2. पीतांबर – पीत है जो अंबर
3. महावीर – महान है जो वीर
4. महापुरुष – महान है जो पुरुष
5. प्रधानाध्यापक – प्रधान है जो अध्यापक
6. कापुरुष – कायर है जो पुरुष
7. नीलकंठ – नीला है जो कंठ
8. कालीमिर्च – काली है जो मिर्च
9. महादेव – महान है जो देव
10.श्वेतांबर – श्वेत है जो अंबर (वस्त्र)
11.सद्धर्म – सत् है जो धर्म
12. नीलगगन – नीला है जो गगन
13. अंधकूप – अंधा है जो कूप
14. लालछड़ी – लाल है जो छड़ी
15. नीलांबर – नीला है जो अंबर
16. सज्जन – सत है जो जन
17. कृष्णसर्प – कृष्ण है जो सर्प
18. महात्मा – महान है जो आत्मा
19. दुरात्मा – दुर् (बुरी) है जो आत्मा
20. कुबुद्धि – कु (बुरी) है जो बुद्धि
21. पर्णकुटी – पर्ण से बनी कुटी
22. प्रधानमंत्री – प्रधान है जो मंत्री
23. नीलकमल – नीला है जो कमल
24. पुरुषोत्तम – पुरुषों में है जो उत्तम
25. परमानंद – परम है जो आनंद
26. भलामानस – भला है जो मानस
27. लालटोपी – लाल है जो टोपी
28. महाविद्यालय – महान है जो विद्यालय
29. अधपका – आधा है जो पका
30. महावीर – महान है जो वीर
उपमान–उपमेय:
1. देहलता – लता रूपी देह
2. चंद्रमुख – चंद्र के समान मुख
3. विद्याधन – विद्या रूपी धन
4. कमलनयन – कमल के समान नयन
5. वचनामृत – अमृत रूपी वचन
6. क्रोधाग्नि – क्रोध रूपी अग्नि
7. संसारसागर – संसार रूपी सागर
8. ग्रंथरत्न – ग्रंथ रूपी रत्न
9. करकमल – कर रूपी कमल
10. मृगलोचन – मृग के समान लोचन
11. चरणकमल – कमल के समान चरण
12. भुजदंड – दंड के समान भुजा
13. कनकलता – कनक के समान लता
14. घनश्याम – घन के समान श्याम (काला)
15. विद्याधन – विद्या रूपी धन
4.द्विगु समास
जिस समास का पूर्वपद संख्यावाचक विशेषण हो उसे द्विगु समास कहते हैं। इससे समूह अथवा समाहार का बोध होता है। जैसे –
सतसई – सात सौ (दोहों) का समाहार
त्रिभुवन – तीन भुवनों (लोकों) का समूह
पंचवटी – पाँच वटों (वृक्षों) का समाहार
अष्टाध्यायी – आठ अध्यायों का समाहार
पंचतत्व – पाँच तत्वों का समूह
नवरात्र – नौ रात्रियों का समूह
दोराहा – दो राहों का समाहार
अष्टसिद्धि – आठ सिद्धियों का समाहार
पंचतंत्र – पाँच तंत्रों का समाहार
त्रिवेणी – तीन वेणियों का समाहार
शताब्दी – शत (सौ) अब्दों (वर्षों) का समाहार
द्विगु – दो गायों का समाहार
त्रिलोक – तीन लोकों का समाहार
पंचरत्न – पंच रत्नों का समाहार
त्रिफला – तीन फलों का समाहार
सप्ताह – सात दिनों का समूह
चौमासा – चार मासों का समूह
दोपहर – दो पहर का समाहार
चारपाई – चार पैरों का समाहार
नवनिधि – नौ निधियों का समाहार
पंजाब – पाँच आबों (नदियों) का समूह
5.द्वन्द्व समास
जिस समास के दोनों पद प्रधान होते हैं तथा विग्रह करने पर ‘और’, अथवा, ‘या’, एवं लगता है, वह द्वंद्व समास कहलाता है। जैसे-
समस्त पद समास-विग्रह
राधा-कृष्ण : राधा और कृष्ण
राजा-प्रजा : राजा और प्रजा
गुण-दोष : गुण और दोष
नर-नारी : नर और नारी
आटा-दाल : आटा और दाल
पाप-पुण्य : पाप और पुण्य
देश-विदेश : देश और विदेश
लोटा-डोरी : लोटा और डोरी
सीता-राम : सीता और राम
ऊंच-नीच : ऊँच और नीच
खरा-खोटा : खरा और खोटा
रुपया-पैसा : रुपया और पैसा
मार-पीट : मार और पीट
माता-पिता : माता और पिता
दूध-दही : दूध और दही
भूल-चूक : भूल या चूक
सुख-दुख : सुख या दुःख
गौरीशंकर : गौरी और शंकर
एड़ी-चोटी : एड़ी और चोटी
लेन-देन : लेन और देन
भला-बुरा : भला और बुरा
जन्म-मरण : जन्म और मरण
पाप-पुण्य : पाप और पुण्य
तिल-चावल : तिल और चावल
भाई-बहन : भाई और बेहेन
नून-तेल : नून और तेल
6. बहुव्रीहि समास
जिस समास के दोनों पद अप्रधान हों और समस्तपद के अर्थ के अतिरिक्त कोई सांकेतिक अर्थ(तीसरा पद) प्रधान हो उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। जैसे –
समस्त पद समास-विग्रह
नीलकण्ठ - नीला है कण्ठ जिसका अर्थात् 'शिव'।
लम्बोदर - लम्बा है उदर जिसका अर्थात् 'गणेश'।
दशानन - दस हैं आनन जिसके अर्थात् 'रावण'।
महावीर - महान् वीर है जो अर्थात् 'हनुमान'।
चतुर्भुज - चार हैं भुजाएँ जिसकी अर्थात् 'विष्णु'।
पीताम्बर - पीत है अम्बर जिसका अर्थात् 'कृष्ण'।
निशाचर - निशा में विचरण करने वाला अर्थात् 'राक्षस'।
घनश्याम - घन के समान श्याम है जो अर्थात् 'कृष्ण'।
मृत्युंजय - मृत्यु को जीतने वाला अर्थात् 'शिव'।
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